दन्त्यारिष्ट के फायदे, नुकसान, उपयोग विधि और प्राइस

दन्त्यारिष्ट Dantyarishta एक आयुर्वेदिक दवा है जो की मुख्यतः रक्तार्श, ब्लीडिंग पाइल्स / बवासी, पुराने कब्ज़ और रक्त दोषो बिमारियों के इलाज में इस्तेमाल होती है। जानिये इसके इस्तेमाल का तरीका क्या हैं।

दन्त्यारिष्ट एक क्लासिकल आयुर्वेदिक दवा है। इसका मुख्य घटक दन्तिमूल है। इसके अतिरिक्त इसमें दशमूल, चित्रक, और त्रिफला भी है। यह औषधि आयुर्वेद के प्रमुख विरेचकों का संयोजन और इस कारण यह मुख्य रूप से रक्तार्श / ब्लीडिंग पाइल्स / बवासीर, bleeding piles पुराने कब्ज़ chronic constipation और रक्त दोषों diseases of blood में लाभकारी है।

इसमें प्रयुक्त द्रव्य स्वभाव से गर्म hot in potency है और शरीर में पित्त बढ़ाते है, कफ पतला करते हैं और वात को कम करते हैं। क्योंकि यह कफ-वातहर और पित्त वर्धक है , इसलिए पित्त प्रकृति के लोगों को इसे सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। इस पेज पर जो जानकारी दी गई है उसका उद्देश्य इस दवा के बारे में बताना है। कृपया इसका प्रयोग स्वयं उपचार करने के लिए न करें।

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नीचे इस दवा के घटक, गुण, सेवनविधि, और मात्रा के बारे में जानकारी दी गयी है।

Dantyarishta is an herbal Ayurvedic medicine with purgative activity. It is combination of purgative and laxative herbs namely Danti roots, Triphala and Chitrak.

Though Dantyarishtam has activity similar to Abhayarishta but it is more purgative in action.

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Here is given more about this medicine, such as indication/therapeutic uses, Key Ingredients and dosage in Hindi language.

  • पर्याय: Dantyarishtam
  • संदर्भ: आष्टांगहृद्यम, सुश्रुत संहिता
  • उपलब्धता: यह ऑनलाइन और दुकानों में उपलब्ध है। Kottakkal Dantyarishtam
  • दवाई का प्रकार: हर्बल आयुर्वेदिक आसव-अरिष्ट
  • प्रमुख प्रयोग: अर्श चिकित्सा
  • दोष पर असर: वातहर, कफहर और पित्तवर्धक
  • दवा के लिए अनुपान: गर्म जल

एक दिन में ली जा सकने वाली मात्रा: दिन में एक से दो बार, 12 से 24 ml की मात्रा वयस्कों द्वारा ली जा सकती है। ध्यान रहे, यह दवा दस्तावर है, ज़रूरत हो तो केवल दिन में एक बार रात में लें। लेने पर यदि अधिक विरेचन हो/दस्त ज्यादा आये तो ली जाने वाली दवा की मात्रा कम कर दें।

दन्त्यारिष्ट के घटक | Ingredients of Dantyarishta in Hindi

  1. दन्तीमूल Danti Baliospermum montanum Roots
  2. दशमूल Dashmula
  3. त्रिफला Triphala
  4. चित्रक Plumbago Zeylanica 8 Tola

दन्त्यारिष्ट को बनाने की कई विधियाँ वर्णित हैं। सुश्रुत संहिता और आष्टांगहृद्यम में इसे बनाने की विधि में थोड़ा अंतर है। सुश्रुत संहिता में इसे बनाने में हरीतकी का प्रयोग बताया गया है।

आष्टांगहृद्यम के अनुसार दन्त्यारिष्ट बनाने की विधि

एक द्रोण जल में दन्तिमूल, दशमूल, त्रिफला, और चित्रकमूल के एक एक पल डालकर पकाएं और चौथाई रहने पर 1 तुला गुड़ और 1 प्रस्थ धाय के फूल डाल कर 15 दिन संधान करें और छान कर पियें।

  • एक द्रोण (One Drona/One Drona)= 12।288 kg/l
  • एक पल (One Pala) = 48 grams
  • 1 प्रस्थ (One Prastha) = 768 grams
  • 1 तुला (One Tula) = 100 Pala = 4।8 kg

दंती, बेलिओस्पर्मम मोंटानम – फैमिली यूफॉरबेसिऐई नामक पौधे की जड़ है जो की आयुर्वेद में मुख्य रूप से जुलाब purgative या दस्त लाने के लिए प्रयोग की जाती है।इंग्लिश में इसे वाइल्ड क्रोटन के नाम से जानते हैं।

आयुर्वेद में दंती के निम्न प्रमुख गुण बताये गए हैं:

भेदी / भेदनीय purgative:

भेदी, भेदक, भेदनीय अथवा भेदन को इंग्लिश में परजेटिव कहसकते हैं। यह वो द्रव्य हैं जो की बंधे हुए या बिना बंधे हुए मल को भेदन कर मलद्वार से शरीर से बाहर कर देते हैं। औषधियों में प्रमुखता से भेदन के लिए प्रयोग किये जाने वाली वनस्पतियों के कुछ उदाहरण हैं: दन्तीमूल, चित्रक मूल निशोथ, आक का दूध, अरंड बीज, कलिहारी, करंज, शंखिनी, कुटकी, और सत्यानाशी।

आचार्य सुश्रुत ने दंती मूल को श्यामादिगण में बताया है। श्यामादिगण, आचार्य सुश्रुत द्वारा बताये हुई भेदक वनस्पतियों का एक समूह है। इस समूह के अन्य दस्तावर हैं: काली निशोथ, सफ़ेद निशोथ, लाल निशोथ, शंखिनी, बकायन, अमलतास, गिलोय, सेहुंड, विधारा, स्वर्णक्षीरी आदि।

रेचक / विरेचक laxative:

विरेचक अथवा विरेचन उन द्रव्यों को कहते हैं जो की बिना पचे हुए मल को पतला कर वेग के साथ मल द्वार से शरीर से बाहर निकाल देती हैं।

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आचार्य चरक ने रेचक की तरह, दंती मूल,त्रिफला, काली निशोथ, सफ़ेद निशोथ,सप्तला, कम्पीपल्लक, करंज, स्वर्णक्षीरी, पीलू, अमलतास, द्रवन्ति, समुद्रफल को वर्णित किया है।

  • रस: कटु pungent
  • गुण: गुरु, तीक्ष्ण heavy, sharp
  • वीर्य: उष्ण hot potency
  • विपाक: कटु pungent

दंती, अग्नि प्रदीपक, तीक्ष्ण, गर्म तथा गुदरोग, पथरी, शूल, गलम, खुजली, कोढ़, रक्तविकार, कफ, सूजन, उदर रोग, और कृमि को दूर करने वाली है।

दशमूल Dashmula आयुर्वेद में बृहत् पंचमूल ( बेल, गंभारी, अरणि, पाटला , श्योनक) और लघु पंचमूल (शलिपर्णी, प्रश्निपर्णी, छोटी कटेली, बड़ी कटेली और गोखरू) का संयोग है। यह त्रिदोषनाशक है। इसके सेवन से शरीर में सूजन, खांसी, सिर दर्द, बुखार, दर्द, अरुचि, अफारा (पेट में गैस), जोड़ों का दर्द आदि नष्ट होते हैं। यह वात रोगों में प्रयोग की जानी वाली उत्तम औषध है।

त्रिफला Triphala (फलत्रिक, वरा) आयुर्वेद का सुप्रसिद्ध रसायन है। यह आंवला, हर्र, बहेड़ा को बराबर मात्रा में मिलाकर बनता है। यह रसायन होने के साथ-साथ एक बहुत अच्छा विरेचक, दस्तावर भी है। इसके सेवन से पेट सही से साफ़ होता है, शरीर से गंदगी दूर होती है और पाचन सही होता है। यह पित्त और कफ दोनों ही रोगों में लाभप्रद है। त्रिफला प्रमेह, कब्ज़, और अधिक पित्त नाशक है।

चित्रक का वानस्पतिक नाम प्लम्बेगो जेलेनिका ( Plumbago zeylanica) हैं। इसे अंग्रेजी में वाइट लीडवोर्ट कहते हैं। यह सूजन दूर करने वाली, पाचन को उत्तेजित करने वाली और एंटीसेप्टिक जड़ी बूटी है।

दन्त्यारिष्ट के फायदे | Benefits of Dantyarishta in Hindi

  1. यह विरेचक है।
  2. यह भेदक है।
  3. इसके सेवन से भोजन में रूचि बढ़ती है और पाचन ठीक होता है।
  4. यह कब्ज़ को दूर करती है।
  5. कब्ज़ के कारण पाइल्स / बवासीर में बहुत अधिक तकलीफ होती है, ऐसे में इसका सेवन मल को निकालने में मदद करता है, जिससे मोशन के दौरान दर्द कम होता है।
  6. इसके सेवन से शरीर में जमी गंदगी दूर होती है।
  7. यह खून को साफ़ करती है जिससे त्वचा रोगों में लाभ होता है।

दन्त्यारिष्ट के चिकित्सीय उपयोग | Uses of Dantyarishta in Hindi

यह दवा अर्श की चिकित्सा में प्रयोग की जाती है।

यह गुणों में अभयारिष्ट के समान ही है लेकिन यह उसकी तुलना में अधिक अनुलोमन और विरेचक है।

  1. अर्श, पाइल्स piles
  2. पाचन की कमजोरी digestive weakness
  3. पुराना कब्ज़ chronic constipation
  4. ग्रहणी रोग malabsorbtion
  5. पांडु रोग anemia
  6. कुष्ठ skin diseases
  7. उदर रोग abdominal diseases
  8. शोथ swelling
  9. प्लीहा विकार diseases of spleen
  10. गुल्म रोग Gulma
  11. टीबी / राजयक्ष्मा Tuberculosis
  12. छर्दी vomiting
  13. कृमि रोग intestinal parasites

सेवन विधि और मात्रा | Dosage of Dantyarishta in Hindi

  1. यह आयुर्वेद का अरिष्ट है और इसे लेने की मात्रा 12-24 मिलीलीटर है।
  2. दवा को पानी की बराबर मात्रा के साथ-साथ मिलाकर लेना चाहिए।
  3. यह दस्तावर है इसलिए दिन में केवल एक या दो बार ही लें।
  4. या डॉक्टर द्वारा निर्देशित रूप में लें।
  5. इस दवा को ऑनलाइन या आयुर्वेदिक स्टोर से ख़रीदा जा सकता है।

सावधनियाँ/ साइड-इफेक्ट्स/ कब प्रयोग न करें Cautions/Side effects/Contraindications in Hindi

इसे निर्धारित मात्रा में लें।

  1. इसे खाली पेट न लें।
  2. इसमें 5-10% self-generated अल्कोहल है।
  3. यह आयुर्वेद की आसव – अरिष्ट प्रकार की दवा है। इसमें किण्वन के दौरान अल्कोहल उत्पन्न होता है। यह अल्कोहल दवा के शरीर में सही से और जल्दी अवशोषण में मदद करती है।
  4. इसे बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
  5. इसे ज्यादा मात्रा में न लें।
  6. गर्भावस्था में इसका सेवन न करें।
  7. इसे स्तनपान के दौरान न लें।
  8. छोटे बच्चों को यह न दें।
  9. 12 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को इसे डॉक्टर की सलाह पर दें।
  10. अधिक मात्रा में दंती का सेवन उलटी, दस्त और शरीर में दर्द कराता है।
  11. दवा के सेवन के अदुरान किसी भी प्रकार का साइड इफ़ेक्ट हो तो सेवन रोक दें।
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One thought on “दन्त्यारिष्ट के फायदे, नुकसान, उपयोग विधि और प्राइस

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