क्षुधाकारी वटी के फायदे, नुकसान, उपयोग विधि और प्राइस

क्षुधाकारी वटी या बटी, एक आयुर्वेदिक दवाई है जो की नींबू, त्रिकुटा, अकरकरा, शुद्ध टंकण आदि से बनी है। इस दवा को मुख में रख कर चूसने से क्षुधा बढ़ती है। यह क्षुधा कारी है मतलब भूख को बढ़ाती है।

यह बटी स्वादिष्ट और रोचक है तथा मुंह में रखते ही लारस्राव के साथ घुल जाती है और पाचन में सहयोग करती है। क्षुधाकारी वटी अरोचक, अजीर्ण, मन्दाग्नि, पेट में दर्द, खट्टी डकार, पेट फूलना, गैस बनना आदि में लाभदायक है।

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इस पेज पर जो जानकारी दी गई है उसका उद्देश्य इस दवा के बारे में बताना है। कृपया इसका प्रयोग स्वयं उपचार करने के लिए न करें।

Kshudhakari Vati, is Ayurvedic medicine for improving appetite, digestion and assimilation. It is very palatable and helps in digestive and respiratory disorders.

Here is given more about this medicine, such as indication/therapeutic uses, Key Ingredients and dosage in Hindi language.

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  • उपलब्धता: यह ऑनलाइन और दुकानों में उपलब्ध है।
  • दवाई का प्रकार: आयुर्वेदिक दवाई
  • मुख्य उपयोग: पाचन की कमजोरी
  • मुख्य गुण: पित्त वर्धक, कफ और वात-शामक

क्षुधाकारी वटी के घटक | Ingredients of Kshudhakari Vati in Hindi

नींबू का रस, सेंधा नमक, घी, चीनी। सोंठ, मरीच, पिप्पली, सफ़ेद जीरा, काला जीरा, शुद्ध टंकण, अकरकरा, नींबू का सत्त्व।

त्रिकटु सौंठ, काली मिर्च और पिप्पली का संयोजन है। यह आम दोष (चयापचय अपशिष्ट और विषाक्त पदार्थों), जो सभी रोग का मुख्य कारण है उसको दूर करता है। यह बेहतर पाचन में सहायता करता है और यकृत को उत्तेजित करता है। यह तासीर में गर्म है और कफ दोष के संतुलन में मदद करता है। यह पाचन और कफ रोगों, दोनों में ही लाभकारी है। इसे जुखाम colds, छीकें आना rhinitis, कफ cough, सांस लेने में दिक्कत breathlessness, अस्थमा asthma, पाचन विकृति dyspepsia, obesity और मोटापे में लिया जा सकता है।

अदरक का सूखा रूप सोंठ या शुंठी कहलाता है। सोंठ को भोजन में मसले की तरह और दवा, दोनों की ही तरह प्रयोग किया जाता है। सोंठ का प्रयोग आयुर्वेद में प्राचीन समय से पाचन और सांस के रोगों में किया जाता रहा है। इसमें एंटी-एलर्जी, वमनरोधी, सूजन दूर करने के, एंटीऑक्सिडेंट, एन्टीप्लेटलेट, ज्वरनाशक, एंटीसेप्टिक, कासरोधक, हृदय, पाचन, और ब्लड शुगर को कम करने गुण हैं।

काली मिर्च न केवल मसाला अपितु दवा भी है। इसे बहुत से पुराने समय से आयुर्वेद में दवाओं के बनाने और अकेले ही दवा की तरह प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में इसे मरीच कहा जाता है। इसे गैस, वात व्याधियों, अपच, भूख न लगना, पाचन की कमी, धीमे मेटाबोलिज्म, कफ, अस्थमा, सांस लेने की तकलीफ आदि में प्रयोग किया जाता है। इसका मुख्य प्रभाव पाचक, श्वास और परिसंचरण अंगों पर होता है। यह वातहर, ज्वरनाशक, कृमिहर, और एंटी-पिरियोडिक हैं। यह बुखार आने के क्रम को रोकता है। इसलिए इसे निश्चित अंतराल पर आने वाले बुखार के लिए प्रयोग किया जाता है।

पिप्पली उत्तेजक, वातहर, विरेचक है तथा खांसी, स्वर बैठना, दमा, अपच, में पक्षाघात आदि में उपयोगी है। यह तासीर में गर्म है। पिप्पली पाउडर शहद के साथ खांसी, अस्थमा, स्वर बैठना, हिचकी और अनिद्रा के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है। यह एक टॉनिक है।

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त्रिकटु या त्रिकुटा के तीनो ही घटक आम पाचक हैं अर्थात यह आम दोष का पाचन कर शरीर में इसकी विषैली मात्रा को कम करते हैं। आमदोष, पाचन की कमजोरी के कारण शरीर में बिना पचे खाने की सडन से बनने वाले विषैले तत्व है। आम दोष अनेकों रोगों का कारण है।

सेंधा नमक, सैन्धव नमक, लाहौरी नमक या हैलाईट (Halite) सोडियम क्लोराइड (NaCl), यानि साधारण नमक, का क्रिस्टल पत्थर-जैसे रूप में मिलने वाला खनिज पदार्थ है। इसे त्रिकुटा के साथ लेने पर गैस नहीं रहती, पाचन ठीक होता है तथा हृदय को बल मिलता है।

टंकण, टंकन, टैंक, टंगन, द्रावक, टंकणक्षार, रंगक्षार, रंग, रंगद, सौभाग्य, धातुद्रावक, क्षारराज आदि सभी सुहागे या बोरेक्स के नाम हैं। आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी, एलोपैथी, होमियोपैथी चिकित्सा पद्यति में इसे दवाई की तरह भी प्रयोग किया जाता है। सुहागे में मूत्रल, संकोचक, एंटासिड, और एंटीसेप्टिक गुण हैं। इसे स्वभाव से गर्म माना गया है। यह पित्तवर्धक और कफनाशक है। सुहागा अग्निवर्धक, विष, ज्वर, गुल्म, आम, शूल, और कासनाशक है। यह भेदक, कामोद्दीपक, पित्तजनक है। यह वमन, वातरक्त, और खांसी को दूर करने वाला है। आयुर्वेदिक दवाओं, जैसे की रजःप्रवर्तिनी वटी, लक्ष्मीविलास रस, में सुहागे भी एक घटक है।

सुहागे को निर्मल करने के लिए, एक भाग सुहागे का पाउडर कर चौबीस भाग साफ़ पानी में डालकर उसे घुला कर, तेज़ आग पर पकाकर और जब लगभग सारा पानी उड़ जाए तो तल में बचे गीले पदार्थ को सुखा कर, जो पाउडर बनता है वह शुद्ध सुहागा होता है। इस प्रकार से साफ़ सुहागा बोरिक एसिड के स्थान पर उपयोग होता है।

आकारकरभ, अकरकरा, करकरा आदि एनासाइक्लस पायरेथम के संस्कृत नाम हैं। इसका अरेबिक नाम आकिरकिर्हा, ऊदुलकई और फ़ारसी में तर्खून कोही है। इंग्लिश में इसे पाइरेथ्रम रूट, पेलेटरी रूट, स्पेनिश पेलिटरी Pellitory Root आदि नामों से जानते हैं। यह मुख्य रूप से मुख रोगों, दांत में दर्द, गले की दिक्कतों, मुंह के लकवे, मिर्गी, कमजोर नाड़ी, लार न बहने, पित्त की कमजोरी, कफ की अधिकता आदि में प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में इसे पित्त वर्धक और कफ नाशक माना गया है। यूनानी में इसे तीसरे दर्जे का रुक्ष और गर्म माना गया है। अकरकरा की जड़ का मुख्य सक्रिय तत्व पेलिटोरिन है अथवा पारेथ्रिन है। यह अकरकरा को तीक्ष्ण और लार बहाने के गुण देता है। यह स्वाद व स्वभाव में कुछ-कुछ काली मिर्च के पिपरिन जैसा है।

क्षुधाकारी वटी के फायदे | Benefits of Kshudhakari Vati in Hindi

  1. यह वात-कफ को कम करती है।
  2. यह पित्त वर्धक है।
  3. इसके सेवन से पित्त स्राव बढ़ता है और पाचन सही करता है।
  4. यह भूख न लगना, जी मिचलाना, पाचन की कमजोरी, अजीर्ण में लाभ देता है।
  5. यह बहुत स्वादिष्ट और रोचक है।

क्षुधाकारी वटी के चिकित्सीय उपयोग | Uses of Kshudhakari Vati in Hindi

  1. बदहजमी
  2. पेट में दर्द
  3. खट्टी डकार
  4. पेट फूलना
  5. गैस बनना
  6. पाचन की कमजोरी

क्षुधाकारी वटी की सेवन विधि और मात्रा | Dosage of Kshudhakari Vati in Hindi

2-4 गोली, दिन में दो-तीन लें।

इसे मुंह में रख कर चूसें।

सावधनियाँ/ साइड-इफेक्ट्स/ कब प्रयोग न करें Cautions/Side effects/Contraindications in Hindi

  1. गर्भावस्था में कोई दवा बिना डॉक्टर की सलाह के न लें।
  2. इसे बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
  3. इसे ज्यादा मात्रा में न लें।
  4. यह प्रकृति में उष्ण है।
  5. ज्यादा मात्रा में सेवन पेट में जलन, एसिडिटी कर सकता है।
  6. निर्धारित मात्रा में लेने किसी भी तरह का गंभीर साइड-इफ़ेक्ट नहीं है।
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