एम्बरग्रीस Ambergris in Hindi

एम्बरग्रीस को संस्कृत में अग्निजार, वहिनजार, अम्बरसुगंध, अम्ब्रेम और लैटिन में अम्बरग्रीस कहते है। यह पदार्थ समुद्र से मिलता है। लाल सागर, अफ्रीका और ब्राज़ील के पास के समुद्र में यह ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। अम्बरग्रीस व्हेल का वमन है। एम्बरग्रीस बनता कैसे है, इसकी पूरी जानकारी अभी भी नहीं है।

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ambergris

एम्बरग्रीस स्पर्म व्हेल की आंतों में बनने वाला पदार्थ है। यह उसकी आँतों को स्क्विड, अन्य मछलियों के काटों आदि से बचाने का काम करता है। इसको आम भाषा में व्हेल वोमिट भी कहा जाता है।

व्हेल की आंत से यह समुद्र में या तो उल्टी या फिर उसके मल द्वारा पहुँचता है। सालों पानी में तैरने, सूरज की गर्मी तथा समुद्र के लवणों से यह मोम जैसा पदार्थ बन जाता है। ताज़ा एम्बरग्रीस समुद्री वस्तु और मल की तरह गंध करता है जबकि पुराना होने पर यह अपनी गंध बदल लेता है। यह खुले समुद्र में तैरता हुआ या समुद्री किनारों पर मिलता है।

यह एक मोम जैसा पदार्थ है जिसका रंग पीला, गुलाबी और काला सा होता है। शुद्ध पीली झाईं वाले अम्बर को उत्तम और काले रंग वाले को उससे कम आंका जाता है।

एम्बर की पहचान

शुद्ध एम्बर को निम्न तरीकों से पहचाना जाता है:

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  1. कांच की शीशी में रखकर, जब आंच पर गर्म किया जाता है तो यह पिघल जाता है और तेल की तरह बहने लगता है।
  2. शुद्ध एम्बर को आग पर डालने से सुगन्धित धुंआ छोड़ता है।
  3. चबाने पर मोम जैसा लगता है तथा मुंह को सुगन्धित कर देता है।
  4. आंच दिखाते ही यह भाप बनकर उड़ने वाली औषधि है।
  5. यह पानी में नहीं घुलता अपितु तेल की भाँती अल्कोहल, ईथर, तेल, वसा आदि में घुलता है।

कुछ जानकारी

  • पर्याय: whale ambergris, grey amber, ambergris, floating gold
  • मुख्य प्रयोग: मस्क की ही तरह इसका भी प्रयोग इत्र, परफ्यूम और खुशबू बनाने के लिए किया जाता है।
  • अन्य प्रयोग: दवा की तरह
  • दवा की तरह प्रयोग करने पर:
  • औषधीय मात्रा: 125 mg से 350 mg
  • हानिप्रद: आँतों को
  • हानिनिवारक: गोंद बबूल, धनिया, तवाशीर। कपूर सूंघने से भी इसका असर कम होता है।
  • अभाव में: कस्तूरी, केशर का प्रयोग किया जाता है
  • गुण: उष्णवीर्य, कटु, लघुपाकी
  • दोष: वात, कफ कम करने वाला और पित्त बढ़ाने वाला

अम्बर के औषधीय प्रयोग Medicinal Uses of Ambergris

आयुर्वेद में इसे चिकना, चरपरा, कहा गया है। यह रस/स्वाद में कटु और तासीर में गर्म है। यह गुण में लघु और पित्त वर्धक है। यह वात और कफ को दूर करने वाली औषध है। इसे पक्षाघात, हृदय के रोग, नपुंसकता, यकृतरोग, उदररोग, प्लीहारोग, सर के रोग, आधाशीशी / माइग्रेन, धनुर्वात, खांसी, जलोदर, आदि में प्रयोग किया जाता है।

यह एक वाजीकारक दवाई है है जो की सेक्स की इच्छा को बढ़ाती है।

यूनानी में इसे पहले दर्जे का रुक्ष और दूसरे दर्जे का गर्म माना गया है। यह जिस्मानी, रूहानी और नफ्सानी /मानसिक, ताकतों को दृढ करता है। यह शरीर को हर तरह की ताकत देने वाला, जान बचाने वाला, इन्द्रियों को ताकत देने वाला और रोगों का नाशक है। अम्बर कामेच्छा को बढ़ाता है, और बाह्य एवं आंतरिक इन्द्रियों को शक्ति देता है और बलवान करता है।

पुरुषों के लिए यह अत्यंत हितकारी है। यह लकवा, बेहोशी, जोड़ों के दर्द, पेट के दर्द और लीवर के रोगों को नष्ट करता है। यह शीतल प्रकृति के लोगों के लिए उत्तम है।

  • पौरुष ताकत / मर्दाना ताकत बढ़ाने के लिए इसका सेवन सोने के वर्क, मोती की भस्म और शहद के साथ किया जाता है।
  • कफ रोग में, इसे पान में रखकर खाया जाता है।
  • दर्द में, इसे लौंग, जायफल के साथ लेते हैं।
  • ब्राह्मी और शंखाहुली के साथ मिलाकर इसे शहद के साथ चाटने से पागलपन/ उन्माद दूर होता है।
  • कमजोरी,मिर्गी, स्नायु दुर्बलता, संक्रामक रोगों, हैजे आदि में इसका प्रयोग लाभकारी है।

सावधानियां और नुकसान

  • यह आँतों को नुकसान पहुंचाता है। आंत रोग होने पर इसका सेवन नहीं करना चाहिए।
  • यह शीतल प्रकृति वालो के लिए उत्तम और पित्त प्रकृति के लोगों केलिए नुकसानदायक है।
  • इसे कम मात्रा में लिया जाना चाहिए।
  • अधिक मात्रा में यह नुकसान करता है।
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