चव्य – जावा पिप्पली Piper retrofractum in Hindi

चव्य, चविका, चाब, चब, चई, चवक, आदि पाइपर चाबा अथवा पाइपर रेट्रोफ्रैकटम के नाम है। यह पिप्पली कुल का तथा मलाया द्वीपसमूह का आदिवासी पौधा है। इसे जावा पिप्पली के नाम से भी जाना जाता है। भारतवर्ष में चव्य की लता जंगली रूप से कहीं भी नहीं पायी जाती। लेकिन कुछ प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है।

चव्य, पाइपर चाबा के सुखाये हुए काण्ड (लता के तने) होते हैं तथा इसमें अल्कालॉयड, ग्लाइकोसाइड और स्टेरॉयड पाए जाते है। यह पञ्चकोल का एक घटक है।

piper retrofractum benefits

पंचकोल चूर्ण, पांच द्रव्यों के बारीक चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर बनाया जाता है। पंचकोल के पांच द्रव्य हैं, पीपल, पीपलामूल, चित्रक, सोंठ और चव्य। यह चूर्ण पाचन की कमजोरी को दूर करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके सेवन से भूख बढ़ती है, पाचन सही होता है, गैस की शिकायत दूर होती है, तथा कफ की अधिकता भी दूर होती है। उष्णवीर्य जड़ी-बूटियों के संयोग से बनने के कारण इसे लम्बे समय तक नियमित नहीं लिया जाना चाहिए। एक सप्ताह में इसे एक दो बार ही लिया जाना चाहए। आयुर्वेद में वैसे भी पिप्पली का लम्बे समय तक प्रयोग निषेध किया गया है।

भारतीय बाजारों में चव्य की बहुत ही कम मात्रा उपलब्ध है। इसलिए काली मिर्च अथवा पिप्पली के सूखे हुए काण्ड को ही चव्य के रूप में प्रयोग कर लिया जाता है।

This page gives information about Piper chaba Hunter non Blume. SYNONYM Piper retrofractum Vahl. or Piper officinarum DC. in Hindi language. Piper chaba produces the long pepper of European commerce, and knows as Java long pepper in English and Chavi, Chavika and Chavya in Ayurveda.

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It is considered to have the same properties as Indian Long Pepper / Pippali or Piper longum. It is sold in the bazars as Mothi pippali, and the stem as Chaba, Chai or Chavak.

सामान्य जानकारी

पाइपर चाबा अथवा पाइपर रेट्रोफ्रैकटम एक लता वनस्पति है। इसके तने और डालियों से जड़ें निकलती हैं। इसके पाते अन्य पाइपर जीनस के पौधे जैसे लम्बगोल, अंडाकार-भालाकार होते हैं। इसकी फलमंजरी बेलनाकार, पीपली जैसी होती हैं।

  • वानस्पतिक नाम: पाइपर चाबा
  • कुल (Family): पिपरेसीएइ
  • औषधीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल भाग: काण्ड
  • पौधे का प्रकार: लता
  • वितरण: भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से दक्षिण राज्यों में की जाती है।

चव्य के स्थानीय नाम / Synonyms

  1. संस्कृत: चविका, चव्य Chavika
  2. हिन्दी: चव्य Chavya
  3. अंग्रेजी: जावा लाग पीपर, Chavya
  4. असमिया: Chepaan
  5. बंगाली: चई, Chei
  6. गुजराती: Chavka, Chavaka
  7. कन्नड़: Kadumenasinaballi, Chavya
  8. मलयालम: Kattumulaku, Kattumulakunveru
  9. मराठी: चवक Chavaka
  10. उड़िया: Chainkath
  11. पंजाबी: Chabak
  12. तमिल: Chavyam, Chevuyam
  13. तेलुगु: चेइकम Chevyamu
  14. उर्दू: Peepal Chab, Kababah

चव्य का वैज्ञानिक वर्गीकरण Scientific

  1. किंगडम Kingdom: प्लांटी Plantae – Plants
  2. सबकिंगडम Subkingdom: ट्रेकियोबाईओन्टा Tracheobionta संवहनी पौधे
  3. सुपर डिवीज़न Superdivision: स्परमेटोफाईटा Spermatophyta बीज वाले पौधे
  4. डिवीज़न Division: मैग्नोलिओफाईटा Magnoliophyta – Flowering plants फूल वाले पौधे
  5. क्लास Class: मैग्नोलिओप्सीडा Magnoliopsida – द्विबीजपत्री
  6. सबक्लास Subclass: मग्नोलीडेइ Magnoliidae
  7. आर्डर Order: पिप्रेल्स Piperales
  8. परिवार / कुल Family: पिपरेसीएइ Piperaceae – Pepper family
  9. जीनस Genus: पाइपर एल Piper L – pepper
  10. स्पीश Species: पाइपर चाबा
  11. लैटिन / वानस्पतिक नाम: Piper chaba Hunter non Blume.

पर्याय

  • Piper retrofractum Vahl.
  • Piper officinarum DC.

चव्य के संघटक Phytochemicals

चव्य में पिपरीन और वाष्पशील तेल होता है। इसमें अल्कालॉयड, स्टेरॉयड और ग्लाइकोसाइड भी पाए जाते है।

चव्य के आयुर्वेदिक गुण और कर्म

चव्य स्वाद में कटु, गुण में रूखा करने वाला, हल्का और तेज है। स्वभाव से यह गर्म है और कटु विपाक है।

यह कटु रस औषधि है। कटु रस जीभ पर रखने से मन में घबराहट करता है, जीभ में चुभता है, जलन करते हुए आँख मुंह, नाक से स्राव कराता है जैसे की सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, लाल मिर्च आदि।

कटु रस तीखा होता है और इसमें गर्मी के गुण होते हैं। गर्म गुण के कारण यह शरीर में पित्त बढ़ाता है, कफ को पतला करता है। यह पाचन और अवशोषण को सही करता है। इसमें खून साफ़ करने और त्वचा रोगों में लाभ करने के भी गुण हैं। कटु रस गर्म, हल्का, पसीना लाना वाला, कमजोरी लाने वाला, और प्यास बढ़ाने वाला होता है। यह रस कफ रोगों में बहुत लाभप्रद होता है। गले के रोगों, शीतपित्त, अस्लक / आमविकार, शोथ रोग इसके सेवन से नष्ट होते हैं। यह क्लेद/सड़न, मेद, वसा, चर्बी, मल, मूत्र को सुखाता है। यह अतिसारनाशक है।

इसका अधिक सेवन शुक्र और बल को क्षीण करता है, बेहोशी लाता है, सिराओं में सिकुडन करता है, कमर-पीठ में दर्द करता है। पित्त के असंतुलन होने पर कटु रस पदार्थों को सेवन नहीं करना चाहिए।

  • रस (taste on tongue): कटु
  • गुण (Pharmacological Action): लघु, रुक्ष, तीक्ष्ण
  • वीर्य (Potency): उष्ण
  • विपाक (transformed state after digestion): कटु

यह उष्ण वीर्य है। वीर्य का अर्थ होता है, वह शक्ति जिससे द्रव्य काम करता है। आचार्यों ने इसे मुख्य रूप से दो ही प्रकार का माना है, उष्ण या शीत।

उष्ण वीर्य औषधि वात, और कफ दोषों का शमन करती है। यह शरीर में प्यास, पसीना, जलन, आदि करती हैं। इनके सेवन से भोजन जल्दी पचता (आशुपाकिता) है।

विपाक का अर्थ है जठराग्नि के संयोग से पाचन के समय उत्पन्न रस। इस प्रकार पदार्थ के पाचन के बाद जो रस बना वह पदार्थ का विपाक है। शरीर के पाचक रस जब पदार्थ से मिलते हैं तो उसमें कई परिवर्तन आते है और पूरी पची अवस्था में जब द्रव्य का सार और मल अलग हो जाते है, और जो रस बनता है, वही रस उसका विपाक है। कटु विपाक, द्रव्य आमतौर पर मल-मूत्र को बांधने वाले होते हैं। यह शुक्रनाशक माने जाते हैं। और शरीर में गर्मी या पित्त को बढ़ाते है।

कर्म Principle Action

  1. उष्ण: यह प्यास, जलन, मूर्छा करता है और घाव पकाता है।
  2. वातहर: द्रव्य जो वातदोष निवारक हो।
  3. पित्तकर: द्रव्य जो पित्त को बढ़ाये।
  4. कफहर: द्रव्य जो कफदोष निवारक हो।
  5. विरेचन: द्रव्य जो पक्व अथवा अपक्व मल को पतला बनाकर अधोमार्ग से बाहर निकाल दे।
  6. पाचन: द्रव्य जो आम को पचाता हो लेकिन जठराग्नि को न बढ़ाये।
  7. दीपन: द्रव्य जो जठराग्नि तो बढ़ाये लेकिन आम को न पचाए।
  8. भेदन: द्रव्य जो बंधे या बिना बंधे मल का भेदन कर मलद्वार से निकाल दे।

प्रमुख आयुर्वेदिक औषधियां

  1. पंचकोल चूर्ण
  2. चन्द्रामृत रस
  3. प्राणदा गुटिका आदि

रोग जिनमे चव्य लाभप्रद है

  1. अपच, बदहजमी
  2. भूख न लगना
  3. कोलिक
  4. कफ रोग
  5. शूल / गैस का दर्द
  6. कृमि

चव्य के औषधीय उपयोग Medicinal Uses of Chavya in Hindi

  1. चव्य को मुख्य रूप से पाचन और कफ रोगों में प्रयोग किया जाता है।
  2. पित्तवर्धक होने से यह पाचन में सहयोग करती है और उष्ण वीर्य होने से कफ को कम करती है।
  3. यह प्लीहा रोगों, गुल्म, गैस, और पेट दर्द भी प्रयोग की जाती है।
  4. यह वातहर, कफहर, पित्तकर, दीपन और पाचन है।
  5. यह प्रसव के बाद की शिथिलता और कमजोरी, तथा अफारा, बदहजमी, दर्द आदि में दी जाती है।

चव्य की औषधीय मात्रा

चव्य चूर्ण को लेने की औषधीय मात्रा एक से दो ग्राम है।

सावधनियाँ/ साइड-इफेक्ट्स/ कब प्रयोग न करें Cautions/Side-effects/Contraindications

  1. यह पित्त को बढ़ाती है। इसलिए पित्त प्रकृति के लोग इसका सेवन सावधानी से करें।
  2. अधिक मात्रा में सेवन पेट में जलन, एसिडिटी, आदि समस्या कर सकता है।
  3. जिन्हें पेट में सूजन हो gastritis, वे इसका सेवन न करें।
  4. शरीर में यदि पहले से पित्त बढ़ा है, रक्त बहने का विकार है bleeding disorder, हाथ-पैर में जलन है, अल्सर है, छाले हैं तो भी इसका सेवन न करें।
  5. आयुर्वेद में उष्ण चीजों का सेवन गर्भावस्था में निषेध है। इसका सेवन गर्भावस्था में न करें।
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