अल्जाइमर रोग Alzheimer’s Disease में उपयोगी जड़ी बूटियाँ

अल्जाइमर्स, मुख्य रूप से उम्र से जुड़ा, अपरिवर्तनीय, प्रगतिशील neurodegenerative रोग है जो गंभीर स्मृति हानि, असामान्य व्यवहार, व्यक्तित्व परिवर्तन, और संज्ञानात्मक कार्य में गिरावट का कारण है।

अल्जाइमर का कोई इलाज नहीं है, और वर्तमान में रोगों के उपचार के लिए उपलब्ध दवाओं की प्रभावशीलता सीमित है। एलोपैथिक दवाओं के साइड इफेक्ट्स भी बहुत होते हैं और यह लम्बे समय तक दी भी नहीं जाती। अल्जाइमर्स रोग मध्यम आयु वर्ग के और बुजुर्ग वयस्कों में डेमेंशिया का सबसे सामान्य प्रकार है। इसके लक्षण आम तौर पर 60 वर्ष की उम्र के बाद दिखाई देते हैं। हालांकि इसके होने के कारण अज्ञात है लेकिन फिर भी आनुवांशिकी स्पष्ट रूप से 10% से 15% मामलों के लिए जिम्मेदार है। वर्तमान में अल्जाइमर रोग का इलाज करने के लिए उपलब्ध दवाएं, केवल इसके लक्षणों को सीमित करती हैं।

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आयुर्वेदिक औषधीय पौधों के प्रयोग से मस्तिष्क रोगों में लाभ होता है। आयुर्वेद में कुछ महत्वपूर्ण जड़ी बूटियाँ जो मेधा को बढ़ाती हैं और दिमाग के फंक्शन को ठीक करती हैं। यह नूट्रोपिक दवाएं और ब्रेन के डिजनरेशन को रोकने में मदद कर सकती हैं। दरअसल, कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने अल्जाइमर के इलाज के लिए विभिन्न आयुर्वेदिक औषधीय पौधों और उनके घटकों के उपयोग का वर्णन किया है।

यह जड़ी बूटियाँ कैसे काम करती हैं, यह तो अभी भी स्पष्ट नहीं है लेकिन पौधों के विभिन्न हिस्सों के फाइटोकेमिकल अध्ययन ने कई महत्वपूर्ण यौगिकों की उपस्थिति दिखायी है, जैसे कि lignans, flavonoids, tannins, polyphenols, triterpenes, sterols, और alkaloids, जो कि एक औषधीय गतिविधियों का व्यापक स्पेक्ट्रम गतिविधि जैसे एंटी इन्फ्लेमेटरी, एंटी-एमायलोइडोजेनिक anti-amyloidogenic (एमायलोइड अंगों और ऊतकों में पाए जाने वाले असामान्य रेशेदार, बाह्य, प्रोटीनयुक्त जमावट हैं, यह अल्जाइमर रोग करने में बड़ी भूमिका निभाता है), एंटी-कोलेनेस्टेरेज़ anti-cholinesterase (एंटी-कोलेनेस्टेरेज़ दवाओं का एक वर्ग है जो एसिटाइलकोलाइन (मस्तिष्क में एक रासायनिक संदेशवाहक) के टूटने को कम करता है और उन परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें संदेश प्रेषण की स्पष्ट कमी होती हैं जैसे अल्जाइमर रोग) हाइपोलिपडिमिक और एंटीऑक्सीडेंट प्रभाव शामिल हैं।

हर्बल दवाएं अल्जाइमर की प्रगति और लक्षणों को संशोधित करने के लिए कई विकल्प प्रदान करती हैं। औषधीय पौधों में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो पूरे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव डालते हैं। हर्बल दवाएं लम्बे समय तक लेने के लिए भी सुरक्षित रहती हैं।

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अल्जाइमर रोग क्या है?

अल्जाइमर रोग या एडी, में मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पल क्षेत्र में सेनाइल प्लाक बन जाते हैं जिससे समय के साथ दिमाग का सही से काम करना नष्ट होता जाता है।

अल्जाइमर रोग में हिप्पोकैम्पस की संरचनाओं में न्यूरॉन्स का नष्ट हो जाते है।

हिप्पोकैम्पस, समुद्री घोड़े के लिए लैटिन नाम है। दिमाग में इस आकार के हिस्से के लिए नाम हिप्पोकैम्पस नाम दिया गया है। यह ऐसी प्रणाली ( लिम्बिक सिस्टम) का हिस्सा है जो कई शारीरिक कार्यों को निर्देशित करता है। यह प्रणाली मस्तिष्क के मध्य के लोब में स्थित है, लगभग मस्तिष्क के केंद्र के पास। यह मस्तिष्क की मेडियल टेम्पोरल लोब के भीतर स्थित अंग है। हिप्पोकैम्पस में दीर्घकालिक स्मृति होती है, जिसमें सभी अतीत के ज्ञान भी शामिल है, यह भावनाओं को नियंत्रित करता है और । नेविगेशन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हिप्पोकैम्पस, सीखने और स्मृति के लिए महत्वपूर्ण है। बुजुर्गों में यह सिकुड़ने लगता है जिससे याददाश्त की समस्याएं होने लगती हैं।

  • अल्जाइमर का रोग हिप्पोकैम्पस में शुरू होता और इसमें वयस्क व्यक्ति के हिप्पोकैम्पस में प्रगतिशील नुकसान होते हैं। मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस क्षेत्र में हुए मस्तिष्क कोशिकाओं के नुकसान से व्यक्ति को डिमेंशिया होने लगता है।
  • प्रारंभिक लक्षण में अल्पकालिक स्मृति का नुकसान, नई जानकारी सीखने में असमर्थता, मूड में बदलाव, शब्दों को खोजने में कठिनाई, नाम भूलना और आइटम खोने में असमर्थता होने लगती है।
  • हताशा, बेचैनी और चिड़चिड़ापन आम भावनात्मक विशेषताएं हैं।
  • गंभीर मामलों में, रोगी पूरी तरह से असंयमी होते हैं, स्मृति पूरी तरह से चली जाती है, और समय और स्थान का पता लगना भी बंद हो जाता है।
  • रोग जब बहुत बढ़ जाता हैं है तो रोगी पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं और अंत में व्यापक देखभाल की आवश्यकता होती है।
  • मरीज की अन्य पर निर्भरता के कारण, पूर्णकालिक नर्सिंग देखभाल के साथ एक नर्सिंग होम में नियुक्ति आवश्यक हो जाती है।
  • इस प्रकार, एडी रोगी प्रबंधन में भी काफी समस्या होने लगती है।

आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ और अल्जाइमर

आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्यति, भारत में विकसित और प्रयोग की जाने वाली हजारों साल पुरानी पारंपरिक औषधि की प्रणाली है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में संपूर्ण शरीर तंत्रिका तंत्र और इसके साथ जुड़े विकारों के लिए औषधियां वर्णित है। इन ग्रंथों में आयु-संबंधित स्मृति हानि, मानसिक रोग से बचने, देखभाल और चिकित्सीय हस्तक्षेप आदि के बारे में बताया गया है।

कई जड़ी-बूटियों और उनके गुणों को तंत्रिका तंत्र संबंधी विकारों के लिए उपयोग किए जाने की व्याख्या की गई है, जिनमें स्मृति हानि शामिल है। नीचे विभिन्न आयुर्वेदिक औषधीय नर्वेइन जड़ी-बूटियों का वर्णन किया जा रहा है जो मस्तिष्क कार्यों में सुधार ला कर अल्जाइमर की चिकित्सा में लाभप्रद हो सकती हैं।

अश्वगंधा (Withania somnifera)

अश्वगंधा एक पौधे की जड़ें हैं। यह स्वाद में कसैला-कड़वी और मीठी है। तासीर में यह गर्म hot in potency है। अश्वगंधा का सेवन वात और कफ को कम करता है लेकिन बहुत अधिक मात्रा में सेवन शरीर में पित्त और आम को बढ़ा सकता है। यह मुख्य रूप से मांसपेशियों muscles, वसा, अस्थि, मज्जा/नसों, प्रजनन अंगों reproductive organ, लेकिन पूरे शरीर पर काम करती है। यह मेधावर्धक, धातुवर्धक, स्मृतिवर्धक, और कामोद्दीपक है। यह बुढ़ापे को दूर करने वाली औषधि है। अश्वगंधा पाउडर को दूध, घी के साथ लेना चाहिए।

  • अश्वगंधा को आयुर्वेद में बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है। यह तंत्रिका टॉनिक, कामोत्तेजक, बलवर्धक, शक्तिवर्धक और शरीर को तनाव के अनुकूल होने में मदद करने वाली औषधि है।
  • यह एक रसायन है जो शरीर में टूट फूट की मरमम्त और अंगों के सही से फंक्शन करने में सहयोगी है।
  • यह स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली में भी मदद करती है।

अश्वगंधा जड़ के कुल एल्कोलोइड निकालने से कई स्तनपायी प्रजातियों में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) पर शांत प्रभाव पड़ा। इसका शरीर पर शांत प्रभाव इसे अल्जाइमर में विशेष रूप से लाभप्रद बनाता है।  अश्वगंधा को तनाव और भूलने की आदत के के लक्षणों में 500 मिलीग्राम / दिन दिया जा सकता है।

  • अश्वगंधा दिमाग में फाइब्रोल गठन रोक सकती है। अश्वगंधा स्मृति और सीखने में वृद्धि करती है।
  • अश्वगंधा के मेथनॉल अर्क को जब चूहों में अमायॉइड पेप्टाइड-प्रेरित मेमोरी लोस में इस्तेमाल किया गया तो इसने इस स्थिति को ठीक कर दिया।

हल्दी (कर्कुमा लोंगा)

हरिद्रा (जिसे रजनी, निशा, निशी, हल्दी, हल्दी, हल्दी के रूप में भी जाना जाता है) कर्कुमा लोंगा पौधे के कन्द होते हैं।

हल्दी अदरक परिवार, ज़िंगाबेरासीई का एक rhizomatous जड़ी बूटियों वाला बारहमासी पौधा है। हल्दी को दवा, मसाले और कलरिंग एजेंट के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके सक्रिय घटकों में कर्क्यूमिन सहित ऑइल और पानी में घुलनशील कर्क्यूमिनोइड्स हैं। कर्क्यूमिन प्रमुख कर्कुमिनोइड है और हल्दी जड़ के पीले रंग के रंग के लिए जिम्मेदार है। यह शरीर में विष को नष्ट करती है और कृमियों को मष्ट करती है। यह एक ब्रॉड स्पेक्ट्रम दवा है जो वात और कफ रोगों में विशेष रूप से लाभप्रद है। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट गुण हैं जो सेल्स को होने वाली क्षति रोकते हैं।

हल्दी में एंटीइन्फ्लेमेंटरी, एंटीसेप्टिक, और जीवाणुरोधी गुण हैं। यह यकृत से विजातीय पदार्थों को दूर करने, कोलेस्ट्रॉल कम करने, एलर्जी से लड़ने, पाचन को उत्तेजित करने, और प्रतिरक्षा को बढ़ावा देने में मदद करने वाली दवा है।

अध्ययन दिखाते हैं दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में अल्जाइमर के मामले 4.4 गुना कम होते हैं जो शायद यहाँ हल्दी के दैनिक भोजन में इस्तेमाल किये जाने से हो सकता है। हल्दी में पाए जाने वाला कर्कुमिन दिमाग में प्लाक बनने का रिस्क कम करता है। कर्क्यूमिन शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट और एंटी-इन्फ्लैमेटरी है।

कर्कुमिन की 4 ग्राम / दिन तक के ओरल सप्लीमेंट लेना सुरक्षित है।

गोटू कोला ( सेंटला एसिटिका )

सेन्टेला एशियाटिका को संस्कृत में मन्डूकपर्णी, हिंदी में कुला कुड़ी, ब्राह्मी, और लैटिन में गोटूकोला या इंडियन पेनीवर्ट भी कहते हैं, बुद्धिवर्धक है। इसके पत्ते मेंडक के जालीदार पैरों जैसे होते हैं इसलिए इसे मण्डूक पर्णी कहते हैं। यह मेद्य को बढ़ाने वाली वनस्पति है। गोटूकला, मेद्य रसायन, रक्तपित्तहर, रक्तशोधक, व्यास्थापना, और निद्राजनन है। यह बढ़े पित्त को कम करती है और सेंट्रल नर्वस सिस्टम को आराम देती है। इसके सेवन से एकाग्रता, स्मरणशक्ति, और बुद्धिमत्ता बढ़ती है।

  • आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में, गोटू कोला तंत्रिका और मस्तिष्क कोशिकाओं के लिए महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों में से एक है और माना जाता है कि वह बुद्धि, दीर्घायु और स्मृति में वृद्धि करने में सक्षम है। यह एमायलोइड के गठन को रोक सकता है।
  • गोटूकोला को गर्भावस्था में लेते समय बहुत सावधानी की आवश्यकता है। ज्यादा मात्रा में इसका सेवन नारकोटिक है और चक्कर लाता है। इसे चोलेस्त्र्ल और ब्लड शुगर कम करने वाली ददवाओं के साथ सावधानी से लेना चाहिए।

ब्राह्मी ( बाकोपा मोनेंरी )

ब्राह्मी (बाकोपा के रूप में भी जाना जाता है) नम और दलदली क्षेत्रों में पाए जाने वाले कड़वा, लता पौधा है और आमतौर पर आयुर्वेदिक चिकित्सा में तंत्रिका टॉनिक, मूत्रवर्धक, और कार्डियोटोनिक और मिर्गी, अनिद्रा, अस्थमा और गठिया के खिलाफ एक चिकित्सीय एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।

ब्राह्मी का सेवन शरीर में धातुओं को कम करने, प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन को साफ करने, लिपिड पेरोक्साइड्स के गठन को कम करने और फ्री रेडिकल की गतिविधि को बाधित करने से कार्य कर सकता है। यह स्मृति और संज्ञानात्मक कार्य में सुधार करता है।

हिप्पोकैम्पस में, ब्राह्मी प्रोटीन काइनेज़ की गतिविधि बढ़ाती है जो इसके नोट्रोपिक क्रिया में योगदान देती है।

शंखपुष्पि Convolvulus pluricaulis

शंखपुष्पि के पौधे से निकाला ताजा रस भी अच्छा मेद्य रसायन है और मानसिक विकारों में प्रमुखता से प्रयोग होता है। दवा की तरह पूरे पौधे को प्रयोग करते हैं। शंखपुष्पि उन्माद, पागलपण और अनिद्रा को दूर करने वाली औषध है। यह स्ट्रेस, एंग्जायटी, मानसिक रोग और मानसिक कमजोरी को दूर करती है। शंखपुष्पि एक ब्रेन टॉनिक है। शंखपुष्पि पित्तहर, कफहर, रसायन, मेद्य, बल्य, मोहनाशक और आयुष्य है।

शंखपुष्पि के पूरे पौधे को स्मृति और संज्ञानात्मक कार्य में सुधार लाने के लिए आयुर्वेद में इस्तेमाल किया जाता है।

यह एक नर्वस टॉनिक है। यह तनाव हार्मोन, एड्रेनालाईन और कोर्टिसोल के शरीर के उत्पादन को नियंत्रित करके तंत्रिकाओं को शांत करता है। यह तनाव, चिंता, मानसिक थकान और अनिद्रा जैसे तंत्रिका संबंधी विकारों के लिए प्रयोग किया जाता है।

यह सीरम कोलेस्ट्रॉल, एलडीएल कोलेस्ट्रॉल, ट्रायग्लिसराइड्स, और फास्फोलिपिड्स को काफी कम करता है।

शंखपुष्पि का सेवन न्यूरॉन्स की संख्या को बढ़ा सकता है।

ज्योतिष्मती (सेलास्ट्रस पैनिकुलटस )

ज्योतिष्मती (मालकांगनी) को गठिया, दर्द, सूजन, घाव, वात-रोग और अन्य स्थितियों के उपचार के लिए निर्देशित किया जाता है। इसके मस्तिष्क पर होने वाले प्रभावोंसे इसे स्मृति को तेज करने, एकाग्रता और संज्ञानात्मक कार्य में सुधार के लिए आयुर्वेद में सदियों से उपयोग किया जाता है।

इसमें संज्ञानात्मक वृद्धि और एंटीऑक्सीडेंट गुण हैं। यह दिमाग के न्यूरान को होने वाली क्षति को रोकता है।

जटामांसी

सीएनएस में जटामांसी भूमिका पर अध्ययन से पता चला कि Nardostachys jatamansi एक्सट्रेक्ट ने चूहों में क्रोनिक फटीग सिंड्रोम के सभी लक्षणों को कम कर दिया।

इसमें शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट गुण हैं। पौधे के एक्सट्रेक्ट दिए जाने पर युवा और बूढ़े दोनों चूहों में सीखने और मेमोरी में काफी सुधार हुआ। इसके अलावा, यह प्राकृतिक उम्र बढ़ने के कारण होने वाले मेमोरी लोस को भी कम कर देता है। यह आयु-संबंधित मनोभ्रंश वाले मरीजों में स्मृति बहाल करने में उपयोगी साबित हो सकता है।

गुग्गुलु

  • गुग्गुल एक पेड़ से प्राप्त गोंद है। यह मुख्य रूप से शरीर से किसी भी प्रकार की सूजन को दूर करने के लिए प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद में यह आर्थराइटिस, गाउट, रुमेटिस्म, लम्बागो, तथा सूजन को दूर करने में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख औषध है।
  • जानवरों के मॉडल और इंसानों में, गुगुलिपिड का प्रशासन सीरम एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड दोनों को काफी कम करता है।
  • गुग्गुलू में फेरिलिक एसिड, फ़िनॉल और अन्य गैर-फीनोलॉलिक खुशबूदार एसिड होते हैं जो सुपरऑक्साइड कण के शक्तिशाली स्कैनेजर होते हैं और अल्जाइमर और अन्य ऑक्सीडेटिव तनाव-संबंधित बीमारी में फायदा करते हैं।
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अल्जाइमर रोग की आयुर्वेदिक दवाएं

अल्जाइमर में आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों और इनसे बनी दवाओं का सेवन लाभप्रद हो सकता है। नीचे कुछ आयुर्वेद की दिमाग के फंक्शन को बढ़ाने वाली दवाएं दी जा रही हैं जो अल्जाइमर में भी लाभ कर सकती है।

  • पंचगव्य घृत
  • ब्राह्मी घृत
  • मानसमित्र वटकम
  • वचादी चूर्ण
  • शंखपुष्पि घृत
  • सारस्वत चूर्ण
  • सारस्वतारिष्ट आदि।

आयुर्वेदिक चिकित्सा में केवल दवा ही नहीं अपितु खान-पान, आहार, जीवन शैली सभी में परिवर्तन आवश्यक है। यह जानना भी ज़रूरी है मानसिक रोग कुछ दिनों में ठीक नहीं होते और इन रोगों का उपचार लम्बा चलता है। औषधीय तेलों की मालिश, दवाओं के सेवन, योग, प्राणायाम, आदि से मानसिक रोगों में बहुत लाभ होता है।

रोगों की संभावना को कम करने के लिए व्यक्ति को पहले से ही जीवन शैली में बदलाव लाने चाहिए। स्वस्थ जीवन शैली अपनानी चाहिए जिसमें धूम्रपान छोड़ना, बैलेंस्ड डाइट खाने, नियमित व्यायाम करने, शराब नहीं पीने, आदि शामिल है। सामाजिक रूप से सक्रिय रहने, कोलेस्ट्रॉल कम करने और रक्तचाप को कम करने का आपके स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

योगासन और प्राणायाम करने से, सकारात्मक सोच रखने से जीवन में खुश रहने से तथा बेहतर आत्मविश्वास से शरीर में एजिंग की प्रक्रिया को धीरे किया जा सकता है। अपने को व्यस्त रखने से और वे काम करने से जिनसे ख़ुशी मिलती हो, को करने से भी हम अपने जीवन को बेहतर कर सकते हैं।

बेहतर जीवन से शरीर में रोगों के विकसित होने और हो जाने पर ठीक होने की अच्छी संभावना होती है। अल्जाइमर जैसे न्यूरोडेजेनेरेटिव रोग क्योर नहीं है लेकिन पता लग जाने पर दवाओं के माध्यम से रोग की गति को कुछ कम ज़रूर किया जा सकता है।

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