मट्ठा Buttermilk Information and Benefits in Hindi

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मट्ठे को हिंदी में छाछ कहा जाता है। छाछ को दही से बनाया जाता है। दही के मथने पर छाछ तैयार होता है। जिस प्रकार की दही होगी छाछ भी उसी के अनुसार गुणों वाला होगा। जैसे की खट्टी दही से खट्टा, और मधुर दही से मधुर छाछ तैयार होता है।

buttermilk
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छाछ या मट्ठा, स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होता है। यदि मट्ठे में अजवाइन और काला नमक मिलाकर पिया जाए तो पुरानी कब्ज़ दूर होती है। यह पाइल्स में भी लाभ करता है। जलोदर में इसे जीरे, अजवाइन, सेंधा नमक मिलाकर पीना चाहिए। भारी भोजन खाने से यदि अपच हो जाए तो छाछ का सेवन करना चाहिए।

Other names of Chach / Mattha

  1. संस्कृत: छ्च्छिका, तक्र
  2. हिंदी: छाँछ, मट्ठा, तक्र Mattha, Chaanch or Chaas
  3. बंगाली: घोल
  4. मराठी: ताक
  5. गुजराती: छाश
  6. इंग्लिश: बटरमिल्क, Buttermilk

मट्ठे के आयुर्वेद में बताये प्रकार Type of Ayurvedic Mattha / Buttermilk

आयुर्वेद में छाछ बनाने की विधि के आधार पर पांच प्रकार का माना गया है, घोल, मथित, उदश्वित, तक्र तथा छ्च्छिका।

  1. जब बिना पानी मिलाये, दही को मलाई समेत मथा जाता है तो घोल बनता है। यह भारी, गाढ़ा, पुष्टिकारक, और कफकारक है।
  2. जब बिना पानी मिलाये, लेकिन मलाई/घी निकालकर, दही को मथा जाता है तो मथित बनता है। यह पाचन में हल्का है। मथित, वात और पित्तशामक है। यह कफ शामक भी है।
  3. जो आधा पानी और आधा दही डाल कर मथ कर बनता है वह उदश्वित है। यह कफकारक, बलवर्धक, और अत्यंत आमनाशक है।
  4. जो तीन भाग दही में एक भाग पानी डाल मथ कर बनता है वह तक्र है। तक्र हल्का, ग्राही, और पित्त न बढ़ाने वाला, कसैला, तासीर में गर्म, वृष्य, वातनाशक, और ग्रहणी में पथ्य है। यह रूक्ष होने से कफ नाशक है।
  5. जब पानी अधिक पर दही थोड़ा भाग मिलाया गया हो, मथने पर छ्च्छिका बनती है। छ्च्छिका शीतल, हल्की, पित्त, तृष्णा, वातनाशक पर कफकारक है। नमक डाल कर इसका सेवन पाचन को सही करता है।

छाछ के लाभ Health Benefits of Buttermilk / Mattha

  1. यह रोगों को दूर करने में उपयोगी है।
  2. इसके सेवन से पित्त, वात, और कफ दोष दूर होते हैं।
  3. यह पचने में हल्का होता है।
  4. यह तासीर में उष्ण है और इसका शीतकाल में सेवन बहुत लाभप्रद है।
  5. जब अपच हो तो इसका सेवन करना चाहिए।
  6. यह पाचन में सहयोग करता है।

दही के अनुसार मट्ठे के गुण

मट्ठे को गाय, भैस, या बकरी के दूध से बनी दही से बनाया जा सकता है। क्योंकि हर दूध के गुण अलग होते हैं, इसलिए मट्ठे के गुण भी दूध के अनुसार होंगे।

गाय का मट्ठा: यह मट्ठा त्रिदोषनाशक, भूख बढाने वाला, रुचिकारक, बुद्धिवर्धक, होता है। यह बवासीर, संग्रहणी और पेट के विकारों में बहुत लाभदायक होता है।

भैंस का मट्ठा: भैस का दूध भारी होता है। इसमें मलाई भी ज्यादा होती है। इस दूध से बना मट्ठा, कफ बढ़ाने वाला, गाढ़ा होता है। इसका सेवन भी बवासीर, संग्रहणी और पेट के विकारों में लाभप्रद है।

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बकरी का मट्ठा: बकरी का दूध हल्का होता है। इससे बना मट्ठा भी त्रिदोषनाशक, हल्का, चिकना, और पेट के विकारों में लाभप्रद है।

मट्ठे के सामान्य गुण धर्म

मट्ठा स्वादिष्ट, खट्टा sour, और पचने में हल्का light to digest होता है। यह स्वाद में मीठा, खट्टा, या काषाय astringent होता है। यह पचने के बाद मधुर, और तसीर में गर्म hot in potency होता है।

मट्ठा कफ-वात शामक, पाचन को बढ़ाने वाला, मल को बांधने वाला / ग्राही inspissants are medicines which from their stomachic, digestive and heating qualities dry the fluids of the body, लेखन / स्रोतों की सफाई करने वाला remove bad humours and altered constituents of the body by thinning them gradually and thus clearing the system of them, मूत्रल (promote the secretion of urine), हृदय, पेट, यकृत के लिए हितकारी है।

मट्ठे का सेवन पेचिश, दस्त, पाइल्स, परिणामशूल duodenal ulcer (एक प्रकार का शूलरोग जो खाये हुए भोजन के पच जाने पर होता है। इस रोग में छोटी आँतों में भोजन के पाक के बाद जब किट्ट भाग बडी आंतों में पहुंचने लगता है तो उदर भाग में असहाय पीड़ा होने लगती है, यह त्रिदोषज रोग है), पीलिया, खून की कमी, मूत्र रोगों, वातज्वर, गुल्म, वात के कारण दर्द, संग्रहणी, ग्रहणी, सप्रू तथा अन्य पेट रोगों में लाभकारी है।

मट्ठे के खट्टेपन के कारण यह वात का, मीठे होने के कारण पित्त और कसैलेपन के कारण कफ का नाश करता है। इस तरह यह वात-पित्त-कफ दोषों में लाभप्रद है।

आयुर्वेद में मट्ठे को बहुत से रोगों में प्रयोग किया जाता है। इसे दवाओं के साथ अनुपान के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। वात, पित्त और कफ तीनों ही विकारों में मट्ठे का प्रयोग किया जाता है।

मूत्रकृच्छ में मट्ठे को गुड़ मिलाकर और पांडु रोग में चित्रक मिलाकर पीना चाहिए।

वात विकार में

  1. कम खट्टे घोल में, हींग, जीरा और सेंधा नमक मिला कर पीना चाहिए।
  2. सोंठ और सेंधा नमक अल्प अम्ल तक्र में मिलाकर पीने से भी वात विकारों, पाइल्स, लूज़ मोशन, कमर में दर्द आदि में बहुत लाभ होता है।

कफ रोग में

कफ रोग में मट्ठा त्रिकटु Trikatu के साथ लेना चाहिए। त्रिकटु सौंठ, काली मिर्च और पिप्पली का संयोजन है। यह आम दोष (चयापचय अपशिष्ट और विषाक्त पदार्थों), जो सभी रोग का मुख्य कारण है उसको दूर करता है। यह बेहतर पाचन में सहायता करता है और कब्ज करता है। यह यकृत को उत्तेजित करता है। यह तासीर में गर्म है और कफ दोष के संतुलन में मदद करता है।

पित्त रोग में

  1. बिना खट्टे, छाछ में चीनी मिलाकर पीना चाहिए।
  2. पेशाब में जलन, दर्द में मट्ठा गुड के साथ पीना चाहिए।

तक्र किन रोगों में लाभप्रद है?

तक्र या छाछ, शीतकाल, पाचन की कमजोरी, वात-रोग, अरुचि, नाड़ियों में अवरोध, विष, उल्टी, जी मचलाना, बार-बार आने वाला बुखार, पांडू रोग, मोटापे, सप्रू, पाइल्स, पेशाब में जलन, भगंदर, प्रमेह, अतिसार, शूल, प्लीहा, पेट रोग, सफ़ेद दाग, सूजन, अधिक प्यास लग्न, और कृमि में पथ्य है।

सावधानी

  1. आयुर्वेद के अनुसार कुछ परिस्थितियों में तक्र नहीं पीना चाहिए:
  2. शरीर में पित्त की अधिकता में इसे नहीं प्रयोग करना चाहिए.
  3. छाती में घाव, कमजोरी, चक्कर आना, ब्लीडिंग डिसऑर्डर में इसे नहीं पीना चाहिए।
  4. ज्यादा खट्टा, तक्र नहीं पीना चाहिए।
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