पुनर्नवा गदहपूरना Punarnava in Hindi

पुनर्नवा आयुर्वेद में प्रयोग की जाने वाली बहुत ही महत्वपूर्ण औषधि है। इसे बहुत ही प्राचीन समय से शरीर में सूजन, मूत्र रोगों और पथरी में प्रयोग किया जाता रहा है। इसके प्रयोग का वर्णन चरक और शुश्रुत संहिता में भी मिलता है। आयुर्वेद में मुख्य रूप से दो तरह के पुनर्नवा, रक्त पुनर्नवा और श्वेत पुनर्नवा का वर्णन है। लेकिन कुछ निघंटु इसके तीन प्रकार (लाल, सफ़ेद और नीला) भी बताते है। Read in English Medicinal Uses Of Punarnava Herb

रक्त पुनर्नवा का पौधा कुछ लाल – गुलाबी रंग लिए हुए होता है। इसके पत्ते, डंठल, व पुष्प कुछ लाल-गुलाबी रंग के दिखते है। लेकिन श्वेत पुनर्नवा के पुष्प सफ़ेद होते है।

Punarnava ke upyog
By Dinesh Valke from Thane, India (Boerhavia diffusa) [CC BY-SA 2.0 (http://creativecommons.org/licenses/by-sa/2.0)], via Wikimedia Commons
रक्त पुनर्नवा की पहचान के बारे में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। लेकिन श्वेत पुनर्नवा के नाम से दो पौधे, Trianthema portulacastrum तथा Boerhavia verticillata जाने जाते है। सफ़ेद पुनर्नवा को संस्कृत में श्वेतमूल, शोथघ्नी, दीर्घपत्रिका, और वर्षाभू (Trianthema portulacastrum), के नाम से जानते है। यह वर्षा में उत्पन्न होता है और उसके उपरान्त दुर्लभ हो जाता है। वर्षा में ही इसमें पुष्प आते हैं। इसी कारण से इसे वर्षाभू भी कहते हैं। यह मुख्य रूप से ऊँची घास में और सरस भूमि में पाया जाता है। इसके पत्ते गोल, कोमल और मांसल होते हैं। शाखाएं छोटे रोयें युक्त होती हैं। बीज कुछ तिकोने होते हैं।

रक्त पुनर्नवा श्वेत पुनर्नवा से भिन्न है। इसका लैटिन नाम, बोएराविया डिफ्यूजा Boerhavia diffusa है। इसे संस्कृत में रक्तपुष्पा, शिलाटिका, शोथघ्नी क्षुद्रवर्षाभू, वृषकेतु, काठील्ल्क, लाल पुनर्नवा, हिंदी में लाल पुनर्नवा, लाल विषखपरा, लाल गदपुरना, लाल सांठ, साटी, और अंग्रेजी में स्प्रेडिंग हॉगवीड कहते हैं। लाल पुनर्नवा की जड़ से में वर्षा में नए शाख निकलते हैं। भूमि में इसकी जड़ें सुरक्षित होती है जो हर वर्ष बारिश आने पर फिर से नयी हो जाती है। इस कारण यह पुनर्नवा है। यह अपने आप को फिर से नया/नवीन कर लेता है। पुनर्नवा की जड़ें वर्षा के मौसम के बाद भी शुष्क नहीं होती और जीवित रहती हैं। इसके पत्ते और शाखाएं बारिश के दिनों में अधिक देखे जाते है। इसके पत्ते पतले होते हैं और थोड़े लम्बे होते हैं। यह स्वाद में सफ़ेद पुनर्नवा से कम कसैले होते हैं।

पुनर्नवा बहुत ही महत्वपूर्ण औषधि है। यह बढे हुए पित्त और कफ को संतुलित करता है तथा हृदय, यकृत, वृक्क, फेफड़ों और नेत्रों के लिए टॉनिक है। यह वृक्क और मूत्र मार्ग को साफ़ करता है। यकृत से भी यह विषैले पदार्थों को दूर करता है। अपने पसीना लाने, मूत्र बढ़ाने और विरेचक गुण के कारण यह शरीर की गंदगी को दूर कर रोगों को जड़ से दूर करने का काम करता है।

यह मुख्य रूप से शरीर की सूजन को दूर करने, यकृत और वृक्क के रोगों में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख वनस्पति है। इसमें लीवर की रक्षा करने के गुण हैं। डेंगू के बुखार में गिलोय के साथ पुनर्नवा का काढ़ा बनाकर पिलाने से न केवल लीवर का बचाव होता है, इससे टोक्सिन दूर होते हैं अपितु नए रक्त का निर्माण होता है और शरीर में लीवर के सही काम न करने के कारण हो जाने वाले सर्वांग शोथ में लाभ होता है।

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पुनर्नवा अपने मूत्रल गुणों के कारण शरीर में पानी के भर जाने, जलोदर, किडनी – ब्लैडर के स्टोंस आदि सभी में लाभ करता है। पुनर्नवा की सब्जी का प्रयोग करने से शोथ दूर होता है, रक्त का निर्माण होता है और स्वास्थ्य बेहतर होता है। इसका सेवन हृदय, यकृत और वृक्क को ताकत देता है और उनके रोगों को दूर करता है।

पुनर्नवा में पोटैशियम नाइट्रेट होता है जो इसे मूत्रल गुण देता है। अधिक मूत्र जाने के बाद भी शरीर में इसके सेवन से पोटैशियम साल्ट की कमी नहीं होती।

पुनर्नवा पांडुरोग, हिपेटाईटिस, यकृत की खराबी, विषदोष,शूल, शोथ, पथरी, जलोदर, मूत्र अवरोध, मूत्रकृच्छ, हृदय रोग, सूजन, हाथ-पैर में पानी इकठ्ठा हो जाना, अनिद्रा, आदि में अत्यंत प्रभावशाली है।

सामान्य जानकारी

  • वानस्पतिक नाम: बोएराविया डिफ्यूजा Boerhavia diffusa
  • कुल (Family): पुनर्नवा कुल
  • औषधीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल भाग: पूरा पौधा, पंचाग (फूल, पत्ते, जड़ पुष्प, तना) मुख्य रूप से जड़ें
  • पौधे का प्रकार: छोटा पौधा
  • वितरण: पूरे भारत में
  • पर्यावास: छोटे-छोटे फैले हुए पौधे खाली जमीन, सड़क किनारे आदि वर्षा में दिखते हैं।

पुनर्नवा के स्थानीय नाम / Synonyms

  • संस्कृत: भौम, कठिल्लक , कृष्णख्या , क्रूर , लोहित , मंडलपत्रिका , नवा , नव्या , नीला , नीलपुनर्नवा , नीलवर्षाभू , नीलिनी , प्रावृषेण्य , पुनर्भव , पुनर्नवा , रक्तकांदा , रक्तपत्रिका , रक्तपुनर्नवा , रक्तपुष्प , रक्तपुष्पिका रक्तवर्षभू, शिलाटिक , शोणपत्र , शोफ्गनी , शोथाग्नि , श्याम, स्वतपुनार्नावा , वैशाखी , वर्षाभाव , वर्षाभू , वर्षाकेतु , विकासवार , विषघ्नी , विषखर्पर
  • असमिया: : Ranga Punarnabha
  • बंगाली: रक्त पुनर्नवा
  • अंग्रेज़ी: Hog weed, Pig weed, Spreading Hog weed
  • गुजराती: Dholisaturdi, Motosatodo
  • हिन्दी: Gadhapurana, Gadapurna, Lalpunarnava, Sant, Thikri, Beshakapore, Lal Punarnava
  • कन्नड़: Komme Gida, Sanadika, Kommeberu, Komma, Teglame, Ganajali
  • कश्मीरी: Vanjula Punarnava
  • मलयालम: Thazhuthama, Thavizhama, Chuvanna Tazhutawa
  • मराठी: Ghetuli, Vasuchimuli, Satodimula, Punarnava, Khaparkhuti
  • उड़िया: Lalapuiruni, Nalipuruni
  • पंजाबी: ltcit, Khattan
  • तमिल: Karichcharanai, Mukaratte, Mukurattai, Mukkaraichchi
  • तेलुगु: Atika mamidi, Atikamamidi, Erra galijeru
  • सिंहली: Pitasudupala, Pitasudu-Sarana

पुनर्नवा का वैज्ञानिक वर्गीकरण Scientific Classification

  • किंगडम Kingdom: प्लांटी Plantae – Plants
  • सबकिंगडम Subkingdom: ट्रेकियोबाईओन्टा Tracheobionta संवहनी पौधे
  • सुपरडिवीज़न Superdivision: स्परमेटोफाईटा बीज वाले पौधे
  • डिवीज़न Division: मग्नोलिओफाईटा – Flowering plants फूल वाले पौधे
  • क्लास Class: मग्नोलिओप्सीडा – द्विबीजपत्री
  • सबक्लास Subclass: कैरयोफियलेडीए Caryophyllidae
  • आर्डर Order: कैरयोफिलेल्स Caryophyllales
  • परिवार Family: नैकटागिनेसिऐइ Nyctaginaceae
  • जीनस Genus: बोरहाविया Boerhavia
  • प्रजाति Species: बोरहाविया डिफ्यूजा Boerhavia diffusa

पुनर्नवा के संघटक Phytochemicals

  • रक्त पुनर्नवा और श्वेत पुनर्नवा दोनों में ही पुनर्नवीन अल्कालॉयड पाया जाता है।
  • पुनर्नवा में पोटैशियम नाइट्रेट, सल्फेट, क्लोराइड तथा तेल भी पाया जाता है।

पुनर्नवा के आयुर्वेदिक गुण और कर्म

पुनर्नवा त्रिदोषहर, लेखन, शोथहर, दीपन, अनुलोमन, रेचक, हृदय, रक्तवर्धक, कासहर, मूत्रजनन स्वेदजनन, ज्वरघ्न, कुष्ठाघ्न, रसायन, और विषघ्न है। यह मूत्रल होने से शोथहर है। स्वाद में यह कड़वा कसैला, मधुर है। यह गुण में रूक्ष है और मधुर विपाक है। विपाक का अर्थ है जठराग्नि के संयोग से पाचन के समय उत्पन्न रस। इस प्रकार पदार्थ के पाचन के बाद जो रस बना वह पदार्थ का विपाक है। शरीर के पाचक रस जब पदार्थ से मिलते हैं तो उसमें कई परिवर्तन आते है और पूरी पची अवस्था में जब द्रव्य का सार और मल अलग हो जाते है, और जो रस बनता है, वही रस उसका विपाक है। मधुर विपाक के सेवन से शरीर में निर्माण होते हैं।

  • रस (taste on tongue): मधुर, तिक्त, कषाय
  • गुण (Pharmacological Action): रुक्ष
  • वीर्य (Potency):शीत (परन्तु कुछ जगहों पर इसे उष्ण वीर्य माना गया है)
  • विपाक (transformed state after digestion): मधुर

कर्म:

  • अनुलोमन: द्रव्य जो मल व् दोषों को पाक करके, मल के बंधाव को ढीला कर दोष मल बाहर निकाल दे।
  • कफहर: द्रव्य जो कफ को कम करे। anti- phlegmatic
  • कफनिःसारक / छेदन: द्रव्य जो श्वासनलिका, फेफड़ों, गले से लगे कफ को बलपूर्वक बाहर निकाल दे। expectorant
  • मूत्रल : द्रव्य जो मूत्र ज्यादा लाये। diuretics
  • मूत्रकृच्छघ्ना: द्रव्य जो मूत्रकृच्छ stranguryको दूर करे।
  • पित्तहर: द्रव्य जो पित्तदोष पित्तदोषनिवारक हो। antibilious
  • शोथहर: द्रव्य जो शोथ / शरीर में सूजन, को दूर करे। antihydropic
  • श्लेष्महर: द्रव्य जो चिप्चे पदार्थ, कफ को दूर करे।
  • रसायन: द्रव्य जो शरीर की बीमारियों से रक्षा करे और वृद्धवस्था को दूर रखे। toxin
  • विषहर : द्रव्य जोविष के प्रभाव को दूर करे। antidote

आयुर्वेदिक दवाएं जिनमें पुनर्नवा मुख्य घटक है:

  1. पुनर्नवा चूर्ण Punarnava Churna
  2. पुनर्नवादि गुग्गुलु Punarnavadi Guggulu
  3. पुनर्नवारिष्ट , पुनर्नवासव Punarnavarishta, Punarnavasava
  4. पुनर्नवादि तैल Punarnavaadi Taila
  5. पुनर्नवादि मंडूर Punarnava Mandoor / Punarnavadi Mandura
  6. पुनर्नवाष्टक क्वाथ चूर्ण Punarnavashtaka Kvatha Churna
  7. सुकुमार घृत Sukumara Ghrita

पुनर्नवा के औषधीय उपयोग Medicinal Uses of Punarnava in Hindi

पुनर्नवा कड़वा, पाक में चरपरा, रूक्ष, हल्का, ग्राही, कफविकार, पित्त विकार और रुधिर विकार को दूर करने वाला है। यह वीर्य में कहीं तो उष्ण और और कहीं पर शीत माना गया है। ऐसा शायद पुनर्नवा के रूप से प्रयोग किये गये पौधे के भेद से है। रक्त पुनर्नवा को जहाँ शीतल माना जाता है वहीँ सफ़ेद पुनर्नवा उष्ण वीर्य है।

पुनर्नवा एक मृदु विरेचक है जो की शरीर से मल को दूर करने में सहायक है। यह पाचक, मूत्रल, काफनिःसारक, वामक है। इसका सेवन श्वास, सूजाक, शोथ, पीलिया, हेपेटाईटिस, कामला, मूत्रकृच्छ, मूत्रघात, प्लीहा-यकृत वृद्धि समेत बहुत से रोगों में लाभप्रद है। नेत्र रोगों में भी पुनर्नवा का प्रयोग अच्छे परिणाम देता है। बाह्य रूप से पुनर्नवा का लेप विष वाले कीटों के दंश का महाऔषध माना गया है। बिच्छू के काटे पर इसको लगाने से लाभ होता है।

1- शोफ Edema, पूरे शरीर में सूजन

  • पुनर्नवा के पत्तों का शाक बना, सेंधा नमक मिला कर रोटी के साथ सेवन करना चाहिए।
  • पुनर्नवा के काढ़े के साथ गुग्गुल का सेवन करें। अथवा
  • पुनर्नवा के काढ़े / जड़ के पेस्ट को सोंठ के साथ मिला कर दूध के साथ एक मास तक लें। अथवा
  • पुनर्नवा को दूध में उबाल कर लें।

2- शोथ, पेट के रोग, प्लीहा वृद्धि, यकृत वृद्धि, एसिडिटी, बुखार

पुनर्नवासव का सेवन करें।

3- किडनी स्टोंस / गुर्दे की पथरी

  • पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा बनाकर एक माह तक पियें। अथवा
  • पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण + संगेयहूद भस्म 250 mg + शहद, मिलाकर दिन में दो बार, सुबह-शाम सेवन करें। अथवा
  • पुनर्नवा को दूध में उबालकर दिन में दो बार सुबह और शाम पियें।

4- पीलिया

पुनर्नवा के पंचाग / रस / जड़ का काढ़ा/ जड़ के चूर्ण का सेवन करें।

5- जलोदर ascites

पुनर्नवा की जड़ के चूर्ण को शहद के साथ खाएं।

6- दाद

पुनर्नवा के पौधे को पीस बाह्य रूप से लेप किया जाता है।

7- मूत्र की रुकावट urine retention पेशाब रुक जाना

  • पुनर्नवा के पत्तों के रस को दूध मिलाकर सेवन किया जाता है।
  • पुनर्नवा के पंचाग / रस / जड़ का काढ़ा/ जड़ के चूर्ण का सेवन करें।

8- सूजन

पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पियें और बाह्य रूप से प्रभावित स्थान पर लगाएं।

9- आर्थराइटिस, एडिमा, मोटापा, किडनी के रोग, पेशाब के रोग, बढ़ा यूरिक एसिड

पुनार्नावादी गुग्गुल का सेवन करें।

10- खांसी, अस्थमा cough, asthma

पुनर्नवा जड़ का चूर्ण / जड़ का काढ़ा पियें।

11- पित्त की अधिकता से होने वाला बुखार excess heat, fever

पुनर्नवा जड़ का दूध के साथ सेवन करें ।

12- हृदय रोग heart diseases

पुनर्नवा की जड़ और अर्जुन की छाल को दस ग्राम की मात्रा में ले कर काढ़ा बनायें। इसे दिन में दो बार पियें।

13- नींद न आना insomnia

पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा दिन में दो बार पियें।

14- खूनी बवासीर bleeding piles

पुनर्नवा की जड़ को हल्दी के काढ़े के साथ दें।

15- गैस bloating

पुनर्नवा की जड़ का चूर्ण, हींग और काले नमक के साथ लें।

16- रसायन, टॉनिक

सुबह पुनर्नवा जड़ के चूर्ण अथवा पत्तों के रस का सेवन करें।

17- बिच्छू का डंक

रक्त पुनर्नवा के पत्ते तथा अपामार्ग की टहनियों को पीस कर बिचू के डंक पर मसलें।

नेत्र रोगों में पुनर्नवा का प्रयोग Uses of Punarnava in Eye Diseases

1- नेत्रों की फूली

पुनर्नवा की जड़ को घी में घिस कर नेत्र में लगाएं।

2- नेत्रों में खुजली

पुनर्नवा की जड़ को शहद अथवा दूध में घिस कर अंजन की तरह प्रयोग करें।

3- नेत्रों से पानी गिरना

पुनर्नवा की जड़ को शहद में घिस कर लगायें।

4- रतौंधी

पुनर्नवा की जद को कांजी में घिस कर आँखों में लगायें।

पुनर्नवा की औषधीय मात्रा Medicinal Dose of Punarnava

  1. पुनर्नवा के पौधे का रस 10-20ml की मात्रा में लिया जाता है।
  2. जड़ के काढ़े को लेने की मात्रा 50-100ml है।
  3. जड़ का चूर्ण चौथाई से एक टीस्पून की मात्रा में लेना चाहिए।

सावधनियाँ/ साइड-इफेक्ट्स/ कब प्रयोग न करें Cautions/Side-effects/Contraindications

  1. यह मूत्रल है।
  2. यह विरेचक है।
  3. अधिक सेवन पर यह वमनकारी emetic है।
  4. इसका सही मात्रा में सेवन करने पर यह शरीर पर किसी भी तरह का दुष्प्रभाव नहीं डालता।
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