पथरचट्टा Kalanchoe pinnata के बारे में जानकारी और उपयोग

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पथरचट्टा, पथरचूर, पर्णबीज, पाथरकूची, आदि केलेंचोए पिन्नाटा पौधे के नाम हैं। इसे कुछ लोग पाषाण भेद के नाम से भी जानते है। पाषाणभेद PashanBheda पौधे की सही पहचान संदिग्ध है और बहुत से पौधे जो की अश्मरी Stones अथवा पथरी के उपचार में प्रयोग होते हैं, पाषाणभेद कह दिए जाते है। क्योंकि पथरचट्टा में अश्मरीघ्न गुण हैं तथा यह मूत्रल diuretic भी है इसलिए इसे भी पाषाणभेद की ही तह पथरी के उपचार में प्रयोग किया जाता है।

पथरचट्टा के पत्तों में बहुत से औषधीय गुण विद्यमान हैं जिस कारण इसे आंतरिक आर बाह्य दोनों ही प्रकार से प्रयोग किया जाता है। बाहरी रूप से लगाने से खून का बहना, घाव, जलना आदि में यह लाभ करता है। पत्तों का सेवन मुख्य रूप से पथरी तथा मूत्र रोगों urinary disorders के उपचार में होता है।

Read in English Here Medicinal use of Patharchatta or Kalanchoe Pinnata

patharchatta medicinal uses
Forest & Kim Starr [CC BY 3.0 (http://creativecommons.org/licenses/by/3.0)], via Wikimedia Commons
पथरी के अतिरिक्त इसे पेचिश, गैस बनना, फोड़े, फुंसी, घाव, कटना, जलना, अल्सर, बालों में रूसी, कान के दर्द, सर में दर्द, सूजन, पीलिया, लिकोरिया, आदि में भी प्रयोग किया जाता है। यह तासीर में ठंडा होता है। इसे अश्मरीभेदक, मूत्रल, वात-पित्त-कफ शामक, रक्तपित्तशामक, और दर्द निवारक माना गया है। लोक चिकित्सा में इसे उच्च रक्तचाप और गाउट की समस्या में भी प्रयोग किया जाता है। यह शरीर को ठंडक देने वाला cooling और किडनी-लीवर की रक्षा करने वाला पौधा है।

पथरचट्टा का पौधा कैसे लगायें

पथरचट्टा के पौधे को उगाना बहुत ही आसान है। यह बहुत देखभाल वाला पौधा नहीं है और छाया में भी लगाया जा सकता है। पथरचट्टा पौधा बहुत ऊँचा नहीं होता और गमले में भी बहुत सरलता से लग जाता है और बढ़ता है। यदि एक बार यह पौधा लग जाता है तो स्वतः ही आस-पास की जमींन या गमलों में, जहाँ भी इसके पत्ते गिरते हैं, फ़ैल जाता है। इस पौधे में बीज नहीं होते और पत्तों से ही नए पौधे उगते हैं। यही कारण है इसे पर्णबीज के नाम से भी जाना जाता है। पत्तों को यदि पानी में या जमीन में डाल दे तो कुछ ही दिनों में पत्तों के मार्जिन से धागे की तरह जड़ें निकलने लगती है। धीरे-धीरे बहुत से जड़ें निकलती है और फिर छोटी-छोटी पत्तियां निकलती हैं। एक ही पत्ते से कई पौधे पैदा हो जाते है। पौधे को लगाने के लिए मिट्टी इस प्रकार की हो जिसमें बहुत पानी न रुके.

पथरचट्टा को रोज़ पानी देने की आवश्यकता नहीं है. तीन से चार दिन के गैप पर इसमें पानी डालें।

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सामान्य जानकारी

  • वानस्पतिक नाम: Kalanchoe pinnata
  • कुल (Family): क्रेसुलेसीएइ
  • औषधीय उद्देश्य के लिए इस्तेमाल भाग: पत्ते
  • पौधे का प्रकार: क्षुप
  • वितरण: भारत के गर्म और नम भागों में खासकर के पश्चिम बंगाल में प्रचुर मात्रा में। एशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, वेस्टइंडीज, गैलापागोस, मेलानेशिया, पोलिनेशिया और हवाई के अन्य शीतोष्ण क्षेत्रों में
  • पर्यावास: नम, गर्म और छायादार स्थान

स्थानीय नाम / Synonyms

  1. वैज्ञानिक नाम: Kalanchoe Pinnata
  2. संस्कृत नाम: Parn beej, hemsagar, Asthibhaksha, Parnabija, Parnabijah पर्ण बीज, हेमसागर
  3. अंग्रेजी: Air plant, Good luck leaf, Hawaiian air plant, Life plant, American Life Plant, Floppers, Cathedral Bells, Air Plant, Life Plant, Miracle Leaf, Goethe Plant, Wonder of the World, Mother of Thousands
  4. हिन्दी: Patharchattam, Patharchur, Pather Chat, Paan-futti पत्थरचूर
  5. बंगाली: Koppat, Patharkuchi, Gatrapuri, Kaphpata, Koppata, Pathorkuchi
  6. मलयालम: Elachedi, Elamulachi, Ilamarunnu, Ilamulachi
  7. तेलुगु: Ranapala
  8. तमिल: Runa Kalli
  9. यूनानी: Zakhm-hayaat, Zakhm-e-Hayaat, Pattharchoor, Pattharchat ज़ख्म हयात, ज़ख्मे-हयात
  10. सिद्ध: Ranakkalli
  11. चकमा: Jeos, Jeus, Patharkuchi, Roah-Kapanghey
  12. त्रिपुरा: Jeos, Naproking, Pathorkuchi

वैज्ञानिक वर्गीकरण Scientific Classification

  • किंगडम Kingdom: प्लांटी Plantae – Plants
  • सबकिंगडम Subkingdom: ट्रेकियोबाईओन्टा Tracheobionta संवहनी पौधे
  • सुपर डिवीज़न Superdivision: स्परमेटोफाईटा बीज वाले पौधे
  • डिवीज़न Division: मग्नोलिओफाईटा – Flowering plants फूल वाले पौधे
  • क्लास Class: मग्नोलिओप्सीडा – द्विबीजपत्री
  • सब क्लास Subclass: रोसीडए Rosidae
  • आर्डर Order: रोज़ेल्स Rosales
  • परिवार Family: क्रेसुलेसीएइ Crassulaceae (Stonecrop family)
  • जीनस Genus: केलेंचोए Kalanchoe
  • प्रजाति Species: क्लांचोए पिन्नाटा Kalanchoe pinnata

इस प्रजाति के और भी लैटिन नाम हैं,

  1. ब्रायोफिलम पिनाटम Bryophyllum pinnatum (Lam.) Oken
  2. ब्रायोफिलम कैलीसिनम Bryophyllum calycinum Salisb.
  3. कॉटीलीडोन पिनाटा Cotyledon pinnata Lam.

पथरचट्टा के पत्तों के औषधीय गुण

  • अश्मरीघ्न antiurolithiatic: किडनी, ब्लैडर, युरेटर में स्टोंस घुला देना या बनने न देना
  • मूत्रवर्धक diuretic: उत्सर्जित मूत्र की मात्रा बढ़ना
  • एसट्रिनजेंट Astringent: चोट, कट आदि पर लगाने से खून के बहने को रोक देना
  • एनाल्जेसिक analgesic: दर्द में राहत
  • एंटीडाइरिअल anti-diarrheal: राहत या पेचिश रोकना
  • एंटीइन्फ्लेमेटरी Anti-inflammatory: सूजन को कम करना
  • एंटीसेप्टिक antiseptic: संक्रामक एजेंटों के विकास में बाधा कर संक्रमण से बचाना
  • आक्षेपनाशक antispasmodic: अनैच्छिक पेशी की ऐंठन से राहत देना
  • कीटाणुनाशकantibacterial: बैक्टीरिया को नष्ट करना
  • इम्यूनोमॉड्यूलेटरी immunomodulatory: प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया या प्रतिरक्षा प्रणाली के कामकाज को संशोधित करना

पथरचट्टा के पत्तों के औषधीय प्रयोग

पथरचट्टी के पौधे में अल्कालोइड्स, फेनोल्स, फ्लावोनोइड्स, टैंनिंस, एंथोसायनिन्स, ग्लाइकोसाइड्स, बुफडीएनओलिडस, सैपोनिन्स, कूमैरिन्स, सिटोस्टेरोल्स, क्विनिन्स, कैरोटेनॉयड्स, टोकोफ़ेरॉल, लेक्टिंस आदि हैं जो इसे एंटीकैंसर, एंटीऑक्सीडेंट इम्मुनोमोड्यूलेटिंग, एन्टीबॅक्टेरियाल, ऐनथेलमेन्टिक, एन्टीप्रोटोज़ोअल, न्यूरोलॉजिक (सेडेटिव एन्टीकवुलसेंट), एंटी -इंफ्लेमेटरी, एनाल्जेसिक, डियूरेसिस, एंटीयूरोलिथितिक, नेफ्रोप्रोटेक्टिवे, हेपेटोप्रोटेक्टिव,एंटी पेप्टिक अलसर, हाइपोटेन्सिव, एंटीडियाबेटिक और वुंड हीलिंग गुण देते हैं।

  1. पथरचट्टा पथरी की समस्या stone problems में बहुत लाभकारी है। जिन लोगों को बार-बार पथरी होने की शिकायत रहती है, वे इसका नियमित प्रयोग कर सकते हैं। यह पौधा, पथरी में फायदा करता है क्योंकि इसमें मूत्र की मात्रा को बढ़ाने और पत्थर को घुलाने के गुण है।
  2. यह किडनी और मूत्र मार्ग kidney and urinary stones के स्टोंस में फायदेमंद है क्योंकि जब पथरी का आकर छोटा हो या इसके नियमित सेवन से वह छोटी हो गयी हो तो मूत्र के माध्यम से यह शरीर के बाहर निकल जायेगी। लेकिन गाल-ब्लैडर की पथरी में ऐसी कोई संभावना नहीं है।
  3. गालब्लैडर gall bladder से पथरी के बाहर निकलने वाला कोई मार्ग नहीं है। इसलिए गाल ब्लैडर की पथरी में ज्यादातर मामलों में ओपरेशन की ही ज़रूरत पड़ती है। अच्छा तो ही यही होता है जैसे ही आपको इसका पता लगे उसे डॉक्टर को दिखा कर निकलवा लें। नहीं तो यदि यह वहां से निकल गई तो फिर मामला गंभीर हो जाएगा। यह गाल ब्लैडर से निकल कर आगे पतले रास्ते में फंस जायेगी और तब पीलिया, लीवर का इन्फेक्शन आदि हो जाएगा और तब किया जाने वाला ओपरेशन भी बड़ा होगा।
  4. पथरचट्टा मूत्रल है इसलिए मूत्र सम्बन्धी रोगों जैसे की कम पेशाब आना, रुक-रुक के आना, पेशाब का रुक जाना, पेशाब में जलन, आदि में इसका सेवन लाभकारी है। शरीर में यदि पानी की मात्रा अधिक हो water retention, सूजन हो, प्रोस्ट्रेट समस्या हो तो भी इसका प्रयोग करके देखें।
  5. स्त्रियों में प्रदर की समस्या leucorrhoea/white discharge, पेचिश, उलटी, पेट में जलन, शरीर में अधिक गर्मी, पित्त के रोग, रक्तपित्त bleeding disorder, पीलिया jaundice, बुखार, में भी इसे प्रयोग कर सकते हैं।
  6. पेट के अल्सर gastric ulcer में भी इन पत्तों का सेवन लाभ करता है। बाहरी रूप से पत्तों को पीस का पेस्ट के रूप में फोड़े, फुंसी, घाव, जलना, कतना, छिलना, आदि पर लगाते हैं।

पथरचट्टा के सेवन से शरीर पर कोई भी हानिकरक प्रभाव side-effects नहीं होते। इसे प्रयोग करना भी अत्यंत सरल है। दवा की तरह प्रयोग करने के लिए, सुबह व शाम इसके दो से तीन पत्ते चबा कर खाएं। यदि इसमें दिक्कत हो तो पत्तों को पीस लें और निकले रस को पी लें।

पथरचट्टा के कुछ पत्तों का रोजाना सेवन लम्बे समय तक किया जा सकता है। यह शरीर पर किसी भी प्रकार का हानिकारक प्रभाव नहीं डालता। चूहों पर किये एक अध्ययन ने दिखाया पथरचट्टा का प्रयोग गर्भावस्था में बच्चे के विकास पर किसी तरह का बुरा प्रभाव नहीं डालता। प्रयोग के दौरान देखा गया की जिन फीमेल चूहों को यह दिया गया था उनका वज़न गर्भवस्था में अधिक बढ़ा।

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